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    खान-पान को लेकर कुछ ऐसी थी स्वामी विवेकानंद की सोच

    आज स्वामी विवेकानंद की 156वीं जयंती है. उनका जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में हुआ था. विवेकानंद की ओजस्‍वी वाणी ने भारत के हर युवा को बहुत प्रभावित किया था और तभी से वे हर युवा के रोल मॉडल बन गए. इसलिए हर साल उनका जन्मदिन राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है.
    चूंकि स्वामी विवेकानंद बंगाली परिवार से ताल्लुक रखते थे तो बता दें कि वे बचपन में तो बहुत नॉन-वेज खाते थे. उनके परिवार में उनके पापा भी नॉन-वेज खाना बहुत पसंद करते थे.  उनके अनुसार खान-पान और पहनावे का धर्म से कोई संबंध नहीं है.
    जब वे US और UK गए तब उन्हें खान-पान को लेकर काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा था और ऐसे में जिंदा रहने के लिए उन्हें जो मिला उन्होंने वही खाया क्योंकि उनका मानना था कि जीवन का उद्देशय ज्यादा महत्वपूर्ण है न कि खान-पान के नियमों को फॉलो करना. उनकी सोच यह थी कि मनुष्य को जब वर्तमान जैसी परिस्थितियों में राजसिक जीवन जीना होता है तब मांसाहार के अलावा और कोई उपाय नहीं होता है.
    पर जैसे ही वे आध्यात्म की ओर बढ़ने लगे उन्होंने नॉन-वेज त्यागना शुरु कर दिया. उनका कहना था कि जैसा हम खाएंगे वैसा ही हमारा मन हो जाएगा. हमारी सोच वैसे ही बननी शुरु हो जाएंगी. उनके अनुसार खाया पिया न केवल शरीर को प्रभावित करता है बल्कि हमारा स्वभाव, दृष्टिकोण सब वैसे ही हो जाता है. खाना दिमाग को कंट्रोल करता है इसलिए हमेशा सज्ज्नों का आहार करना चाहिए, न कि दुर्जनों का.
    नॉन छोड़ने के बाद भी अगर मांस देवी को चढ़ाया जाता था, तो वे उसे अपने सिर तक रखते थे. ऐसे में आधिकारिक तौर पर यह कहा नहीं जा सकता कि वे नॉन-वेज खाते थे या नहीं.
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