सबरीमाला मंदिर किस चीज का प्रसाद चढ़ता?
सबरीमाला मंदिर में 50 साल से कम उम्र की महिलाओं के प्रवेश की पाबंदी है.
इसी कारण यह मंदिर पूरे देश में चर्चा का विषय बना हुआ है. आइए जानते हैं
मंदिर किस देवता की पूजा होती है, कैसा प्रसाद चढ़ता है?
🍳 विधि
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सबरीमाला मंदिर में 50 साल से कम उम्र की महिलाओं के प्रवेश की पाबंदी है. इसी कारण यह मंदिर पूरे देश में चर्चा का विषय बना हुआ है. आइए जानते हैं मंदिर किस देवता की पूजा होती है, कैसा प्रसाद चढ़ता है?
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सबरीमला, केरल के पेरियार टाइगर अभयारण्य में स्थित एक प्रसिद्ध हिंदू मंदिर है. यहां विश्व का सबसे बड़ा वार्षिक तीर्थयात्रा होती है जिसमें प्रति वर्ष लगभग 2 करोड़ लोग श्रद्धालु शामिल होते हैं.
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केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम से 175 किमी की दूरी पर पंपा है और वहां से चार-पांच किमी की दूरी पर पश्चिम घाट से सह्यपर्वत शृंखलाओं के घने वनों के बीच, समुद्रतल से लगभग 1 किलो मीटर की ऊंचाई पर शबरीमला मंदिर स्थित है.
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सबरीमला शैव और वैष्णवों के बीच की अद्भुत कड़ी है. मलयालम में 'शबरीमला' का अर्थ होता है, पर्वत. वास्तव में यह स्थान सह्याद्रि पर्वतमाला से घिरे हुए पथनाथिटा जिले में स्थित है. पंपा से सबरीमला तक पैदल यात्रा करनी पड़ती है. यह रास्ता पांच किलोमीटर लंबा है.
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सबरीमला में भगवान अयप्पन का मंदिर है. शबरी पर्वत पर घने वन हैं. इस मंदिर में आने के पहले भक्तों को 41 दिनों का कठिन व्रत का अनुष्ठान करना पड़ता है जिसे 41 दिन का 'मण्डलम' कहते हैं. साल में तीन बार जाया जा सकता है- विषु (अप्रैल के मध्य में), मण्डलपूजा (मार्गशीर्ष में) और मलरविलक्कु (मकर संक्रांति में).
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यहां पर जाने वाले श्रद्धालुओं के सिर पर एक पोटली (इरामुडी) होती है. जिसमें नैवेद्य भरा होता है. इसके बारे में ऐसा कहा जाता है कि अगर कोई व्यक्ति तुलसी या रुद्राक्ष की माला पहनकर, व्रत रखकर, सिर पर नैवेद्य से भरी पोटली (इरामुडी) लेकर यहां पहुंचे, तो उसकी मनोकामना जरूर पूरी होती है.
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ये पोटली या बैग कॉटन से बनी होती है. इनके भी कलर कोड होते हैं. अगर श्रद्धालु लाल रंग का बैग लेकर चलता है, उसका मतलब ये है कि इस मंदिर में ये उसकी पहली यात्रा है. इसके बाद तीसरी यात्रा तक नीला रंग का बैग दिया जाता है. इससे और ज्यादा यात्राएं कर चुके लोगों को भगवा रंग के काटन के बैग दिए जाते हैं.
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इतना ही नहीं यहां जाने वाले श्रद्धालुओं को कपड़ों के रंगों के जरिए आसानी से पहचाना जा सकता है. उन्हें काले और नीले रंग की पोशाक पहननी होती है. सिर पर चंदन का लेप लगाना पड़ता है.
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यहां पूजा के बाद सबको चावल, गुड़ और घी से बना प्रसाद 'अरावणा' बांटा जाता है. यहां का दूसरा प्रसाद अप्पम है. सबरीमाला में प्रसाद वाला चावल मवेलिक्कड़ चेट्टीकुलंगड़ा देवी मंदिर से आता है. इस प्रसाद की क्वॉलिटी को बनाए रखने के लिए बोर्ड मैसूर की सेंट्रल फूड टेक्नोलॉजी रिसर्च इंस्टीट्यूट से टेक्निकल गाइडेंस लेता है. इसी इंस्टीट्यूट के लोगों की देखरेख में सबरीमाला मंदिरन में अरावणा, अप्पम और दूसरे प्रसाद बनते हैं.
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