कब, कैसे और कहां बनी पहली बार पानी पूरी?
अगर स्ट्रीट फूड की बात की जाए तो गोलगप्पा या पानी पूरी हर जगह मिल जाएगा. हर शहर के गली-मुहल्ले, चौक-बाजार में कोई एक ऐसी जगह होती है जहां की पानी पूरी वहां के लोगों को बहुत भाती है. गोलगप्पे देखते
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दिशा-निर्देश
आमतौर पर पानी पूरी या गोलगप्पे के नाम से फेमस इस चीज को झारखंड ओडिशा, छत्तीसगढ़ और बिहार में गुपचुप कहा जाता है. जबकि मध्यप्रदेश में यह लोगों में फुल्की के रूप में जानी जाती है. वहीं महाराष्ट्र में इसका नाम पानी पूरी बताशा है तो गुजरात में पानीपूरी. बंगाल और बांग्लादेश में इसको फुचका कहा जाता है.
राजस्थान और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में इसे पताशी नाम से जाना जाता है. जबकि लखनऊ में पांच अलग-अलग टेस्ट के पानी के साथ मिलने वाले पांच स्वाद के बताशे भी काफी फेमस हैं. इसका पानी अमचूर से बनाया जाता है. गुजरात में चपातियों को फुल्की कहा जाता है, लेकिन पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के कुछ हिस्सों में गोल गप्पों को भी फुल्की कहा जाता है. इस नाम से इसे काफी कम लोग जानते हैं. मध्य प्रदेश के होशंगाबाद में गोल गप्पों को टिक्की कहा जाता है. ये तो हो गए गोलगप्पे के नाम. पर असली सवाल तो अब भी बना हुआ है कि पानी पूरी पहली बनी कब? क्यों और कैसे यह आम लोगों की पहली पसंद बन गई?
गोलगप्पे के बनने की कहानी अलग-अलग हैं. लेकिन तीन कहानियां ज्यादा प्रचलित हैं. इसमें महाभारत का भी जिक्र है और शाहजहां का भी.
पहली कहानी-
गोलगप्पे लेकर एक और कहानी प्रचलित है कि जब द्रौपदी पहली बार अपने पतियों संग ससुराल आई थी तब कुंती ने उसे कुछ ऐसा बनाने को कहा था जिससे पांडवों का पेट भर जाए. तब द्रोपदी ने अपनी कला से पानी पूरी यानी गोलगप्पे तैयार किए थे. इसे खाकर पांडव खुश हो गए थे. दौपदी की इस पाक कला से कुंती काफी प्रसन्न हुई. ऐसा भी कहा जाता है कि तभी कुंती ने दौपदी को अमरता का वरदान दिया था.
दूसरी कहानी-
ग्रीक इतिहासकार Megasthenes और चीनी बौद्ध यात्री Faxian और Xuanzang की किताबों में पाया जाता है कि पानी पूरी सबसे पहले गंगा के किनारे बसे मगध साम्राज्य में बनाई गई. तब और भी अन्य स्थानीय खाद्य पदार्थ तैयार हो रहे थे, मसलन- पिट्ठो, तिलवा, चिवड़ा आदि. मगध को आज बिहार के नाम से जाना जाता है.
(Photo- Vishal Ghavri)
तीसरी कहानी-
कुछ लोग मानते हैं कि गोलगप्पे की शुरुआत बनारस हुई है. सन् 1970 में दिल्ली से बच्चों की एक मैगजीन निकलती थी, जिसका नाम रखा गया था ‘गोलगप्पा’. लेकिन कहा-सुना जाने वाला इतिहास कुछ और कहता है. जो लोग दिल्ली आए हैं या यहां रहते हैं उन्हें पुरानी दिल्ली खासकर लाल किले के आसपास के इलाके में जाने का मौका जरूर मिला होगा. जिस जगह चांदनी चौक है, वहां आपने एक चौक देखा होगा जिसे फव्वारा कहते हैं. इस अलकतरे की आज की सड़क पर बादशाह शाहजहां के वक्त में नहरें बनवाई गई थीं, जो यमुना का पानी किले और शहर तक लाती थीं. पूरे शाहजहांनाबाद (उस वक्त की दिल्ली) के बाशिंदे उसी नहर से पानी पिया करते थे.
शाहजहां की बेटी रोशनआरा ने बनवाई पानीपूरी
एक वक्त आया जब उस नहर का पानी किसी वजह से गंदा हो गया और शहर के लोग कै-दस्त से परेशान हो गए. फिर शाहजहां की बेटी रोशनआरा ने शाही हकीम से बीमार लोगों के लिए कोई नुस्ख़ा तैयार करने को कहा. हकीम साहब ने नुस्खा तैयार कर दिया और लोगों को पिलाया. लोग चंगे हो गए पर कुछ लोगों को इसका जायका बहुत मजेदार लगा. सो उन शौकीन लोगों ने इस नुस्खे को बनाना जारी रखा और उसे आटे की छोटी पूरियों में भरकर पिया जाने लगा. तो इस तरह गोलगप्पे का जन्म हुआ जो कहीं फुचका, कहीं गुपचुप, कहीं पानी बताशा, कहीं पानी पूरी और कहीं किसी और नाम से जाना जाने लगा.
जो नहीं बदला वो है इसका पानी
तो यह थी पानी पूरी के बनने की कहानी. जीरा, सोंठ पानी से तैयार होने वाले गोलगप्पों में अब तो मटर चाट, पनीर, छोले भरे जाने लगे हैं. कुछ लोग दही वाली पूरियां भी बना रहे हैं. जैसे-जैसे समय बदला पानीपुरी में डलने वाला मसाला बदलता गया लेकिन जो अभी तक नहीं बदला वो है इसका चटपटा पानी.
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
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