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    क्या है गणगौर पूजा का महत्व, बनते हैं कौन-कौन से प्रसाद


    विधि

    गणगौर पूजा भारत के प्रमुख त्यौहारों में से एक है और यह बहुत ही श्रद्धा भक्ति और उत्साह के साथ मनाया जाता है. होली के दूसरे दिन से शुरू यह पर्व पूरे 16 दिन तक मनाया जाता है. सिर्फ राजस्थान में ही नहीं यूपी, बिहार, झारखंड, कर्नाटक, महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तराखंड और मध्यप्रदेश समेत पूरे भारत में इसके रंग देखने को मिलते हैं. यह पर्व चैत्र महीने की शुक्ल पक्ष की तीज को समाप्त होता है.

    इस दिन कन्या और विवाहित स्त्रियां मिट्टी से गौर बनाकर, उनको सुंदर पोषाक पहनाकर श्रृंगार करती हैं और खुद भी संवरती हैं. कुंवारी कन्याएं इस व्रत को मनपसंद वर पाने की कामना से करती है, तो वहीं विवाहित महिलाएं इसे पति की दीर्घायु की कामना करते हुए करती हैं. महिलाएं 16 श्रृंगार, खनकती चूड़ियां और पायल की आवाज के साथ बंधेज की साड़ी में नजर आती हैं.


    इस पूजा में 16 अंक का विशेष महत्व होता है. गणगौर के गीत गाते हुए महिलाएं काजल, रोली, मेहंदी से 16-16 बिंदिया लगाती हैं. गणगौर को चढ़ने वाले प्रसाद, फल व सुहाग की सामग्री 16 के अंक में ही चढ़ाई जाती.

    गणगौर का उत्सव घेवर और मीठे गुनों के बिना अधूरा माना जाता है. खीर, चूरमा, पूरी, मठरी से  गणगौर को पूजा जाता है. आटे और बेसन के घेवर बनाए जाते हैं और गणगौर माता को चढ़ाए जाते हैं. गणगौर पूजन का स्थान किसी एक स्थान या घर में किया जाता है. गणगौर की पूजा में गाए जाने वाले लोकगीत इस अनूठे पर्व की आत्मा होते हैं.
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