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    अब इस राज्य का हो गया रसगुल्ला

    पिछले कई साल से रसगुल्ले पर अपना मालिकाना हक जताने के लिए पश्चिम बंगाल और ओडिशा सरकारें आमने-सामने थीं. दोनों राज्य की सरकारों ने रसगुल्ले के लिए भौगोलिक पहचान हासिल करने के लिए बाकायदा समितियां भी गठित कीं थीं. इस पर फैसला आ चुका है और जियोग्राफिकल इंडिकेशन (जीआई) ऑफिस ने रसगुल्ले को मूलतः पश्चिम बंगाल का बताया है. 14 नवंबर को पश्चिम बंगाल सरकार को रसगुल्ले के लिए भौगोलिक पहचान/जियोग्राफिकल इंडिकेशन (GI) टैग मिल गया.
    इस पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ट्वीट कर बधाई दी. उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा कि, 'सभी के लिए अच्छी खबर है. पश्चिम बंगाल को रसगुल्ले के लिए जीआई टैग मिलने से हम बेहद खुश और गौरवांवित महसूस कर रहे हैं.'



    इस मामले में ओडिशा के वित्त मंत्री शशि भूसन बहेरा ने कहा कि, पश्चिम बंगाल को रसगुल्ले का जीआई टैग मिलना ओडिशा के साथ अन्याय है. रसगुल्ला हमारी जगन्ननाथ संस्कृति से जुड़ा है. हम फिर इसके खिलाफ केस दायर करेंगे.

    दरअसल, रसगुल्ले के आविष्कार को लेकर पश्चिम बंगाल और ओडिशा के बीच वर्षों से शीतयुद्ध चल रहा था. दोनों ही राज्यों ने कानूनी दांवपेच भी लड़ाए थे. दोनों राज्य यह दावा कर रहे थे कि रसगुल्ले का आविष्कार उनके यहां हुआ है. अंततः जीआई ने ओडिशा के आवेदन को खारिज कर दिया. इसके बाद रसगुल्ले पर बंगाल का एकाधिकार हो गया. अधिकतर लोगों को यही पता था कि रसगुल्ला पश्चिम बंगाल का है जबकि कुछ का अभी भी मानना है कि यह मूलतः ओडिशा का ही है.

    क्या होता है जीआई टैग
    किसी भी उत्पाद का जीआई टैग उसके स्थान विशेष की पहचान बताता है. दरअसल, यह विवाद तब शुरू हुआ जब पहाल में मिलने वाले रसगुल्लों को लेकर ओडिशा सरकार ने जीआई टैग हासिल करने का प्रयास किया था. यहां से इस मिठाई को पश्चिम बंगाल भी सप्लाई किया जाता रहा है. इस पर पश्चिम बंगाल और ओडिशा सरकार के मंत्री आमने-सामने भी आए थे. पश्चिम बंगाल के खाद्य प्रसंस्करण मंत्री अब्दुर्रज्जाक मोल्ला का कहना था कि बंगाल रसगुल्ले का आविष्कारक है. मोल्ला ने इसके पीछे ऐतिहासिक तथ्यों का हवाला देकर कहा था कि बंगाल के विख्यात मिठाई निर्माता नबीन चंद्र दास ने वर्ष 1868 से पूर्व रसगुल्ले का आविष्कार किया था. इसके जवाब में ओडिशा के विज्ञान व तकनीकी मंत्री प्रदीप कुमार पाणिग्रही ने 2015 में मीडिया के समक्ष दावा किया था कि 600 वर्ष पहले से उनके यहां रसगुल्ला मौजूद है. उन्होंने इसका आधार बताते हुए भगवान जगन्नाथ के भोग खीर मोहन से भी जोड़ा था. ओडिशा के इस दावे के खिलाफ पश्चिम बंगाल सरकार ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की बात कही थी.
    ( वो सबकुछ जो आप जानना चाहते हैं कि रसगुल्ला किसका? ओडिशा का या पश्चिम बंगाल का)

    रसगुल्ला और पश्चिम बंगाल
    रसगुल्लों से जुड़ी सबसे प्रचलित कहानी यही है कोलकाता में 1868 में नबीनचंद्र दास ने इसे बनाने की शुरुआत की थी. कई इतिहासकारों की दलील है कि 17वीं शताब्दी से पहले भारतीय खानपान में ''छेना" का जिक्र नहीं मिलता जो रसगुल्ला बनाने के लिए सबसे जरूरी होता है. भारतीय पौराणिक आख्यानों में भी दूध, दही, मक्खन का जिक्र तो मिलता है पर छेना का नहीं मिलता. इस लिहाज से बंगाल का दावा मजबूत है. वैसे, अब तक लोग यही समझते थे कि रसगुल्ला विशुद्ध बंगाली मिठाई है. और तो और इतिहास टटोलेंगे तो कई जगह यह जिक्र भी मिल जाएगा कि रसगुल्ला पुर्तगालियों की किसी डिश का ही विकसित रूप है. यह खबर अगर उड़ते-उड़ते पुर्तगाल पहुंच गई तो तीसरा दावेदार भी आ धमकेगा. बहरहाल दो राज्यों के बीच मिठास भरी जंग जारी है. तथ्य जुटाए जा रहे हैं. छेने की इस लजीज मिठाई को समझने के लिए इसका इतिहास, भूगोल सब कुछ छानना होगा, फिर भी रसगुल्ला हाथ लग जाए, इसकी गारंटी नहीं.

    (इन टिप्स की मदद से बनाएं रसीले रसगुल्ले)

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