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    इसलिए निर्जला एकादशी व्रत में नहीं खाया जाता चावल

    निर्जला एकादशी व्रत में भगवान विष्णु की पूजा की जाती है. ऐसी मान्यता है कि उपवास के कठोर नियमों के कारण सभी एकादशी व्रतों में निर्जला एकादशी व्रत सबसे कठिन मानी जाती है. इसके व्रत में जल और अन्य सेवन नहीं किया जाता है. इस दिन तुलसी और बिल्व पत्र नहीं तोड़ना चाहिए.

    भगवान विष्णु के भोग के लिए तुलसी के पत्ते एक दिन पहले ही तोड़कर रख लेना चाहिए या फिर तुलसी के गिरे हुए पत्तों को साफ जल से धोकर पूजा में उपयोग करना चाहिए. इन सब चीजों के साथ ही कुछ ऐसी चीजें जिन्हें व्रती को नहीं खाना चाहिए. अगर ऐसी चीजें खा लेंगे तो व्रत पूरा नहीं माना जाता है. इसी कारण है कि आज के दिन कुछ चीजों का परहेज करना अनिवार्य होता है.

    ये चीजें तो भूलकर भी न करें
    ऐसा माना जाता है कि केवल कुल्ला या आचमन करने के लिए मुख में जल डाला जा सकता है. अगर जल की एक बूंद भी हलक से नीचे चली गई तो यह व्रत खंडित हो सकता है. निर्जला एकादशी पर दातुन से दांत साफ करने की मनाही होती है. इसके पीछे ऐसा माना जाता है कि एकादशी वाले दिन किसी पेड़ की टहनियों को तोड़ने से भगवान विष्णु नाराज हो जाते हैं. व्रत करने वाले व्यक्ति को आलस्य करना नहीं करना चाहिए.

    चंद्रमा से जोड़ा जाता है चावल को
    एकादशी के दिन चावल नहीं खाना चाहिए. क्योंकि ऐसा माना जाता है कि चावल खाना अखाद्य पदार्थ यानी कि नहीं खाने योग्य पदार्थ खाने का फल दे देता है. वहीं विज्ञान के अनुसार चावल में जल तत्व की मात्रा अधिक होती है. जबकि ज्योतिष शास्त्र की मानें तो जल तत्व की अधिकता मन को विचलित करती है, क्योंकि जल और चंद्रमा में परस्पर आकर्षण होता है. चंद्रमा के कारण समुद्र में ज्वार आता है. इस प्रकार चावल का अधिक सेवन करने से जल तत्व की मात्रा शरीर में बढ़ जाती है जिससे मन अशांत महसूस करता है. और ऐसा माना जाता है कि अशांत मन से किसी भी व्रत का पालन नहीं किया जा सकता है.

    इन चीजों से भी रहें दूर
    वैसे एकादशी व्रत में ज्यादातर नियमों का पालन व्रतियों के द्वारा किया जाता है, लेकिन कुछ चीजों का ध्यान परिवारवालों को भी रखना चाहिए. एकादशी के लहसुन-प्याज से बनी चीजें भूलकर भी नहीं खानी चाहिए. इसे गंधयुक्त और मन में काम भाव बढ़ाने की क्षमता के कारण अशुद्ध माना गया है. इस दिन बैंगन खाना अशुभ माना जाता है. मांस-मदिरा का सेवन करने वालों को नरक की यातनाएं भोगने का विधान शास्त्रों में माना गया है. ऐसी भी मान्यता है कि इस दिन सेम (सेमी) का सेवन करने से संतान के लिए हानिकारक हो सकता है.

    चावल नहीं खाने के पीछे यह कथा है प्रचलित
    एक कथा अनुसार माता के क्रोध से रक्षा के लिए महर्षि मेधा ने देह का त्याग कर दिया था. उनके शरीर का अंश भूमि में समा गया. कालांतर में वही अंश जौ एवं चावल के रूप में भूमि से उत्पन्न हुआ. जब महर्षि का देह भूमि में समाया, उस दिन एकादशी तिथि थी. उसी समय से यह परंपरा बन गई कि एकादशी के दिन चावल और जौ से बने भोज्य पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए. ऐसा माना जाता है कि निर्जला एकादशी पर चावल, जौ और इससे बनने चीजों का सेवन करना महर्षि मेधा के देह के सेवन होता है.

     

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