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    मक्खन बड़े तो कहीं भक्कम पेड़ा, ऐसा है बालूशाही का रोचक इतिहास

    बालूशाही का नाम लेते ही हमारे जेहन बिहार और उत्तरप्रदेश की तस्वीर बनती है. बालूशाही की खासियत ही यही है कि मुंह में डालते ही घुल जाती है. भारतीय मिठाइयों में देसी घी और चाशनी की प्राथमिकता होती है. बालूशाही भी इन दोनों चीजों के बिना नहीं बन सकती है. घी की खुशबू और चाशनी की मिठास लिए बालूशाही हर किसी की पसंदीदा मिठाइयों में से है. हालांकि इसे देश में अलग-अलग नामों से जाना जाता है, लेकिन बनाने का तरीका लगभग एक जैसा ही है. कहीं लाल, कहीं भूरा तो कहीं नारंगी रंग लिए यह मिठाई भारत की ही देन है.

    भारत के साथ ही पाकिस्तानी, नेपाली और बंग्लादेशी व्यंजनों में भी यह खासी पसंद की जाने वाली मिठाई है. हालांकि देखने में यह डोनट की तरह दिखती है, लेकिन इसे जो अलग बनाता है वह है इसका बेमिसाल स्वाद.

    कहीं बालूशाही तो कहीं भक्कम पेड़ा
    बहुत से लोगों को लगता है कि बालूशाही बिहार या उत्तर प्रदेश में सबसे पहले बनी. जबकि जानकारों का मानना है कि बालूशाही का जन्म दिल्ली में हुआ है. यही बालूशाही भारत के नक्शे में नीचे उतरते ही मक्खन बड़ा बन जाती है. जयपुर और उज्जैन जैसे शहरों में दशकों पुरानी दुकानें मक्खन बड़े को अपने लज्जतदार अंदाज में पेश करती आ रही हैं. इन्हीं मक्खन बड़ों में थोड़ा-सा बेकिंग सोडा मिलाकर बाडुशा मिठाई बना दी जाती है जो दक्षिण भारतीय राज्यों की शान है. बालूशाही को गोवा में भक्कम पेड़ा के नाम से जाना जाता है.

    भागलपुर की बालूशाही है निराली
    जबकि बिहार के भागलपुर में मिलने वाली बालूशाही इतनी नर्म और मुलायम होती है कि मुंह में डालते ही घुल जाती है. वैसे पारम्परिक बालूशाही के अलावा पनीर बालूशाही और मावा बालूशाही भी अपने अनूठे स्वाद के लिए प्रसिद्ध हैं. वहीं अब हलवाई और दुकानदार बालूशाही में एक्सपेरिमेंट करने लगे हैं. बालूशाही पर रबड़ी डालकर परोसने का रिवाज चल पड़ा रहा है.

    ऐसे बनती है बालूशाही
    मैदे के मिश्रण, घी और चाशनी से बालूशाही तैयार की जाती है. मैदे की लोइयों को घी में सेंका जाता है फिर चाशनी में डुबोकर कुछ देर बाद निकाला जाता है. यकीन मानिए जब बालूशाही चाशनी में गोता लगाती हैं तो मिठाई बाजार में इसकी खुशबू महक उठती है.

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