ऐसी है घेवर की रोचक कहानी, यहां की है खास मिठाई
बारिश होते ही खान-पान में यूं तो पकौड़े हर कोई पसंद करता है, लेकिन एक खास मिठाई है जो बहुत पसंद की जाती है. जी हां, हम बता रहे हैं घेवर के बारे में. पुराने लोग बताते हैं कि बगैर घेवर के न रक्षाबंध
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दिशा-निर्देश
अब सवाल उठता है कि घेवर की उत्पत्ति कहां हुई तो इस बारे में विस्तृत इतिहास मौजूद नहीं है, लेकिन सर्वसम्मति से इसकी उत्पत्ति राजस्थान से मानी जाती है. घेवर ब्रज क्षेत्र में भी चाव से अलग-अलग तरीके से बनाया और खाया जाता है. जालीदार शक्ल और सूरत के कारण अंग्रेजी भाषी लोग इसे हनीकॉम्ब डेजर्ट के नाम से जानते हैं.
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जैसा कि हमने बताया कि तीज का त्योहार घेवर के बिना अधूरा-सा लगता है. राजस्थान में तीज धूम धाम से मनाया जाता है और इस तीज में मिठास भरने का काम जमाने से घेवर करता आ रहा है. रक्षा बंधन के त्योहार पर ब्रज और उसके आसपास के क्षेत्रों में बहनों का भाई के घर घेवर लेकर जाना भी एक परम्परा-सा ही माना जाता है. ऐसा माना जाता है कि भाई-बहन का यह त्योहार बिना घेवर के पूरा नहीं माना जाता.
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पारंपरिक तौर पर घेवर मैदे और अरारोट के घोल विभिन्न सांचों में डालकर बनाया जाता है. फिर इसे चाशनी में डाला जाता है. वैसे समय के साथ इसमें बनाने के तरीके में तो नहीं, लेकिन सजाने में काफी एक्सपेरिमेंट्स हुए हैं. जिसमें मावा घेवर, मलाई घेवर और पनीर घेवर खास हैं. लेकिन समय के साथ घेवर बनाने, सजाने व परोसने में कई परिवर्तन हुए पर इसका स्वाद वैसा ही है.
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हालांकि अब जगह के साथ ही घेवर के दामों में फर्क होता है. 50 से लेकर 400 रुपये किलो तक का घेवर बिकता है. सादा घेवर सस्ता है जबकि पिस्ता, बादाम और मावे वाला घेवर महंगा होता है. पिस्ता बादाम और मावे वाला घेवर ज्यादा प्रचलित है. हालांकि लोगों मानना है कि जितना मजा सादा घेवर खाने में आता है उतना स्वाद मावा-मलाई वाले में नहीं. फिर भी लोगों की पहली पसंद मावा-घेवर को ही है.
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वहीं मिठास के मामले में घेवर दो तरह को होता है, फीका और मीठा. ताजा घेवर नर्म और खस्ता होता है पर यह ज्यादा दिनों तक रखने से सख्त होने लगता है. वहीं सख्त पड़ गए घेवर को बेसन में लपेटकर, तलकर पकौड़े बनाए जाते हैं. वहीं मीठे घेवर से खीर या पुडिंग भी बनाई जा सकती है.
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
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